उत्सवधर्मी प्रधानमंत्री

उत्सवधर्मी प्रधानमंत्री

उत्सवधर्मी प्रधानमंत्री

वे प्रधानमंत्री हैं. देश के कर्ताधर्ता हैं. उन्हें देश चलाना चाहिए. वे जैसे तैसे चला भी रहे हैं. लेकिन साफ़ दिख रहा है कि ऐसे संकट के समय में भी वे राजनीति कर रहे हैं.

वे बार बार यह साबित करना चाहते हैं कि लोग उनके कहे पर ताली और थाली बजा सकते हैं. लोग उनके कहने पर पांच अप्रैल को रात नौ बजे दिए और मोमबत्तियां भी जलाएंगे. उनको लगता है कि वे इस तरह के आव्हान से इतिहास में दर्ज होते जाएंगे. गांधी ने कहा, करो या मरो. देश ने माना और आज़ादी का रास्ता खुला. नेहरू जी ने कहा कि आराम हराम है और देश नवनिर्माण में लग गया. शास्त्री ने कहा, जय जवान जय किसान और अपील की कि देश के लिए एक जून उपवास करो तो देश ने लंबे समय तक पालन किया. वे इसी तरह से इतिहास में दर्ज होना चाहते हैं. अपनी समझ भर का प्रयोग वे भी कर रहे हैं. उन्होंने ताली-थाली बजवाकर देख लिया. वे यह जानबूझकर अनदेखा कर गए कि ताली-थाली बजनी तो डॉक्टरों, चिकित्साकर्मियों और कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों के लिए थी लेकिन भक्तगण मोदी के लिए ताली-थाली बजाते रहे. वह गो कोरोना गो हो गया. हासिल क्या हुआ? कुछ नहीं.

अब पांच अप्रैल को रात नौ बजे सबको अपने घरों में दिया या मोमबत्ती या टॉर्च जलाना है. नौ मिनट तक. मोदी जी की जय-जयकार. उनकी धमक की चर्चा होगी. बार बार आपको बताया जाएगा कि देखिए उनके एक आव्हान पर देश कैसे एकजुट होता है. हासिल क्या होगा? कुछ नहीं.

कुछ मूर्खों की चर्चा व्हाट्सऐप पर चलती रहेगी कि ध्वनि से कोरोना मरेगा, रोशनी से कोरोना मरेगा. मोदी जी ने सोच समझकर कुछ किया है. नासा के वैज्ञानिक भी ऐसा कह रहे हैं. आदि आदि.

लेकिन कोरोना से लड़ाई में हम कौन सी मंज़िल हासिल कर लेंगे? कुछ नहीं.

आप चतुराई देखिए कि मोदी जी ऐसा कोई आव्हान नहीं करते जिसका असर को आप भांप या नाप सकें. जैसे उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि उद्योगपति और व्यावसायी मज़दूरों को लॉक-डाउन के दौरान तनख्वाह देते रहें. मकान मालिकों से नहीं कहा कि वे किराया न मिलने पर भी ग़रीबों और मज़दूरों को न निकालें. उन्होंने ऐसा कोई आव्हान नहीं किया जिसे लोग नहीं मानेंगे. लाखों मज़दूर पैदल अपने घर जाने के लिए निकल पड़ते हैं, वे चुप रहते हैं. एक आयोजन की वजह से (जो कि सिरे से ग़लत था) देश में सांप्रदायिता का ज़हर फैलाया जाता है, वे चुप रहते हैं. देश के अलग अलग हिस्सों से भूख और पीड़ा की कहानियां आती हैं, वे चुप रहते हैं. उन्हें न नोटबंदी के समय ग़रीबों की पीड़ा समझ में आई थी न अब आ रही है. वे किसानों का दर्द महसूस ही नहीं करते.

वे देश को संबोधित करते हुए यह नहीं बताते कि देश में कोरोना से लड़ाई की कितनी तैयारी हो चुकी है. ग़रीबों को भोजन कैसे मिलेगा? बेरोज़गार किस तरह से अपने दिन काटेगा? अस्पतालों का क्या हाल है?
टेस्ट क्यों नहीं हो रहे हैं? डॉक्टरों को सुरक्षित क्यों नहीं किया जा रहा है? वे चुप रहते हैं.

वे उत्सवजीवी हैं. वे उत्सव का आडंबर खड़ा कर सकते हैं. वे जानते हैं कि भारत की जनता उनकी वही बात मान सकती है जिसमें जेब से एक पैसा न खर्च होता हो. जिससे किसी का हित प्रभावित न होता हो. ताली थाली भी उत्सव था और दिया जलाना भी उत्सव है. एकजुटता के नाम पर. देशहित के नारे पर. वे एक ऐसे तमाशबीन में बदल चुके हैं जो हर दिन एक नया तमाशा खड़ा कर सकता है और मुद्दे की हर बात को नज़र बचाकर हाशिए पर डाल सकता है.

जैसा नीरो के लिए कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था. वैसे ही आने वाले दिनों में लिखा जाएगा कि जब भारत कोरोना से लड़ रहा था तो नरेंद्र मोदी उत्सव मना रहा था
. विनोद वर्मा जी वरिष्ठ पत्रकार के फेस बुक वाल से 

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